Manoj Dhiwar

Hindi Testimony

मेरा जन्म खण्डवा जिले के नेपानगर में हुआ। मेरे परिवार में हम चार बहने और दो भाई थे. इनमें सबसे छोटा मैं था। मैं जब 9 वर्ष का था तब मेरी सबसे बड़ी बहन की मृत्यु हो गयी। उसके बाद मेरे पिता की नौकरी चली गई और हमारी आर्थिक परिस्थिति काफी खराब हो गई, परिवार का सारा भार मेरी बहन अनीता पर आ गया और परिवार का खर्च चलाने के लिए उसने ट्यूशन लेना आरंभ किया। उस समय ट्यूशन से काफी कम पैसे मिलते थे जिससे हमारा खर्च चलना काफी मुश्किल था, कई बार हमें भूखे रहकर दिन काटना पड़ता था। इस वजह से अनीता से छोटी बहन को हमने अपने रिश्तेदार के पास जिनका बेटा अपंग था उसे संभालने के लिए भेजा और कुछ साल बाद मेरे उस बहन की भी मृत्यु हो गई। हमारा परिवार बड़े ही दुख और संकट में जीवन बिता रहा था। जैसे तैसे मैंने अपनी दसवीं तक की शिक्षा प्राप्त की और परिवार की आर्थिक मदद करने के लिए मैं रात के समय ऑटो चलाता और दिन के समय मजदूरी करता था। इस वजह से मैं गलत लोगों की संगति में आ गया और बुरी आदत जैसे सिगरेट, तंबाकू और शराब का आदी हो गया जिससे घर में अशांति का माहौल हो गया। माता पिता ने मुझे आईटीआई ट्रेनिंग के लिए नागपुर भेजा ताकि मेरी बुरी संगति छूट जाए। तब तक अनीता सिस्टर को महाराष्ट्र में ₹400 महीने की टीचिंग जॉब मिल गई और मेरे सारे पढ़ाई का खर्चा उन्होंने उठाया। वहां हॉस्टल में रहते हुए मैं और ज़्यादा बिगड़ गया था। ट्रेनिंग खत्म होने के बाद मैं वापस घर आया, नौकरी नहीं होने के कारण मैं मजदूरी करने लगा। कुछ समय बाद हमारे रिश्तेदार जो कि महू के जिमखाना क्षेत्र में रहते थे वहां मैं उनके घर पर रहने लगा। जिमखाना क्षेत्र के ही कुछ गुंडे और बदमाश लोगों से मेरी दोस्ती हो गई इस प्रकार से मैं और अधिक दादागिरी, झगड़े, लूटपाट, नशा आदि कई प्रकार की बुराई में फस गया। कुछ समय बाद मुझे पिथमपुर में एक हेल्पर की नौकरी मिली जिसका सारा पैसा मैं शराब में उड़ा देता था। करीब 1 वर्ष के बाद बजाज टेंपो में एक टेक्निशियन के तौर पर मुझे एक स्थाई नौकरी मिली जिसके बाद मैंने किराए से कमरा लिया और परिवार के सभी लोग महु आकर रहने लगे। कुछ साल बाद हमारी एक और बहन की मृत्यु हो गई क्योंकि उन्होंने आत्महत्या करली जो की एक पुलिस केस बन गया जिसमें हम काफी समय तक फसे रहे। फिर एक दिन एक मकान के सामने से मम्मी और मेरी बहन अनीता निकलते समय उन्हें प्रभु के गाने की आवाज सुनाई दी जो उनके ह्रदय को छू गई; वह मकान थॉमस ब्रदर का था जहां कॉटेज मीटिंग चल रही थी। मम्मी और अनीता ने उनसे बातचीत की, दोनों चर्च आने लगे लेकिन मैं अभी भी बुरी संगति में फंसा हुआ था। रोज देर रात शराब पीकर आना मेरी दिनचर्या हो गई थी कलीसिया के लोग और प्रभु के दास दासी ने मेरे लिए बहुत प्रार्थना की और 1 दिन ऐसा अवसर आया कि प्रभु की संगति में जाने के लिए प्रभु ने मुझे विवश किया और इंदौर में एक आत्मिक सभा में जाने के लिए जब कलीसिया के लोग एक ट्रेन में बैठे तो मैं एक अलग डिब्बे में जाकर बैठ गया, कुछ समय बाद वहां पास्टर साहब और आनंद भाई आए। उन्होंने मुझे वचन सुनाया और आनंद भाई ने अपनी गवाही बताई जो मुझे बहुत अच्छी लगी। मसीह मंदिर पहुंचने के बाद वहां प्रभु का वचन ने मुझसे बातचीत की “मार्ग यही है इसी पर चलो” धीरे धीरे मैं संगति में आने लगा और प्रभु का वचन सुनना मुझे अच्छा लगने लगा। कहीं ना कहीं प्रभु यीशु की दृष्टि मेरे और मेरे परिवार पर हुई और उन्होंने हमे श्राप और पाप के बंधन से छुड़ाया। आज हम प्रभु में बहुत ही आनंदित है यही नहीं प्रभु ने हमारी सभी परिस्थिति को भी बदल दिया है।

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